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एक प्यार भरी चुदाई की कहानी

हेलो दोस्तों ये कहानी antarvasna sex kahani मेरी और मेरी फ्रेंड के बिच की हैं. आशा करता हु की ये कहानी आपको जरूर पसंद आएगी. यह एक प्यारी सी प्यार भरी चुदाई की कहानी है. यह चुदाई स्टोरी मेरी और मेरी दोस्त अभिलाषा की है जिससे मेरी मुलाकात एक बिज़नस सेमिनार के दौरान नॉएडा में हुई थी। अभिलाषा चंडीगढ़ की रहने वाली है और जैसा आप सबको पता है, पंजाबी लड़कियों में एक अलग कशिश होती है जिनको देख कर मन करता है कि बस चोद दो और चोदते जाओ। उसको देखने के बाद मेरे मन में भी सबसे पहला ख्याल यही आया कि कुछ भी हो, इसको चोदना जरूर है।
बस, फिर क्या था, धीरे धीरे शुरू हुई मेरी फील्डिंग और हम कुछ ही दिनों में अच्छे दोस्त बन गए। हम दोनों की बातों का सिलसिला बढ़ता गया और हम रात रात भर फ़ोन पे बातें करने लगे।
इस सब में करीब 4 महीने निकल गए।

बातों के दौरान ये भी पता चल गया था कि अभिलाषा अपने पति से दूर रहती है और उसको एक अच्छे दोस्त की जरूरत है।
आया सितम्बर का महीना… जब उसका बर्थडे होता है।
मैंने उसको पार्टी के लिए कहा तो उसने मुझे चंडीगढ़ आने का न्योता दे डाला।

फिर क्या था, चूत तो चाहिए थी… जैसे तय हुआ था, उसी अनुसार मैंने चंडीगढ़ की तरफ गाड़ी दौड़ा दी। वहाँ पहुँचने पर मैंने अभिलाषा को इन्फॉर्म किया तो उसने मुझे थोड़ी देर इंतजार करने को बोला।
करीब 2 घंटे बाद वो आई तो मैं उसको देखता ही रह गया। उसने मेरी चूंटी काटी तो मैं होश में आया और हम दोनों ने एक दूसरे से गले मिले। उसके बड़े बड़े चूचे मेरी छाती में गड़ रहे थे और उसके बदन की गर्मी मुझे पिघला रही थी।

मैंने उसको बताया कि वो कितनी हसीन लग रही है और इतना कहकर मैंने उसको गाल पे एक हल्की सी पप्पी दी।

फिर हम दोनों ने भोजन किया और चंडीगढ़ घूमने निकल गए। पूरे दिन उसने मुझे चंडीगढ़ घुमाया और शाम को एक पप्पी के साथ मुझे विदा करने लगी क्योंकि उसको अपने दूसरे दोस्तों को भी जन्मदिन की दावत देनी थी।
मुझे इस मुलाकात से संतुष्ट न देखते हुए उसने मुझसे कारण पूछा.
मैंने बताया कि मैं इतनी दूर तेरे से मिलने आया और हम ठीक से साथ में समय भी नहीं बिता पाए!
तो हम दोनों में ये तय हुआ कि हम अगले हफ्ते ही शिमला घूमने जाएंगे।

वो दिन मैंने कैसे काटे, ये बस मैं जानता हूँ पर इस बीच हम दोनों ने फ़ोन पे पप्पियाँ लेना और देना शुरू कर दिया था।

एक दिन मैंने उससे उसका साइज भी पूछा ताकि आगे का रास्ता खुले पर उसने बताने से मना कर दिया।
मैंने कहा कि अगर नहीं बताएगी तो जब भी हम मिलेंगे तो मैं खुद नाप लूंगा और उसने कुछ नहीं कहा।

बस अब इंतज़ार था तो शिमला जाने का।
और फिर आया वो दिन जब हम दोनों चंडीगढ़ से शिमला के लिए रवाना हुए।

मैंने चलते ही अभिलाषा का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसको धीरे धीरे सहलाता रहा। कुछ दूर चलने के बाद मैंने अपना हाथ अभिलाषा के घुटने पर घुमाना शुरू किया जिससे वो मुस्कुराने लगी।
मेरे पूछने पे उसने बताया कि उसको गुदगुदी हो रही है और मैं ऐसे ना करूँ।
तो मैंने अपना हाथ थोड़ा ऊपर बढ़ाया और अब मेरा हाथ उसकी जाँघों पर था जिसको उसने झट से हटा दिया।

हम थोड़ी ही देर में शिमला पहुँचने वाले थे जब मैंने अभिलाषा को याद दिलाया कि मैंने उसका नाप लेना है और उसने फिर से मुस्कुरा कर बात टाल दी तो मुझे थोड़ा साहस बना।
मैंने फिर से अपने हाथ को उसकी जांघ पे रख दिया और इस बार उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। इधर हम दोनों धीरे धीरे एक दूसरे से खुलते जा रहे थे और उधर मेरा लंड भी अब अंगड़ाई लेने लगा था।

मैंने अब अभिलाषा के गले में हाथ डाल दिया और उसको थोड़ा अपनी तरफ खींच लिया। थोड़ी ही देर में अभिलाषा ने अपना सर मेरे कंधे पे रख दिया और मैंने उसका सीधा हाथ पकड़ कर अपनी जांघ पे रख दिया। थोड़ी और आगे चलने पर मैंने गाड़ी धीरे करते हुए साइड में ली और अभिलाषा के होंठों पे अपने होंठ रख दिए जिसका उसने समर्थन तो नहीं किया पर उसने कोई विरोध भी नहीं किया
इतने में उसने मुझे झटका और सामने देखने को कहा क्योंकि हमारी गाड़ी आगे चल रहे ट्रक के बहुत करीब पहुँच गई थी।
अभिलाषा ने फिर मुझसे वो कहा जो मैंने सुनने को पता नहीं कब से बेकरार था। वो बोली- राहुल, पहले शिमला तो चलो फिर मैं और तुम दो दिन एक दूसरे के ही साथ हैं। ऐसे सड़क पे तो कोई भी दुर्घटना होने की सम्भावना है।

फिर थोड़ा सब्र और थोड़े सफर के बाद हम शिमला पहुँचे।
होटल में कमरे की बात आई तो मैंने नाम लिखाया श्रीमती एवं श्री राहुल, जिसपे अभिलाषा थोड़ी चौंक गई पर अगले ही पल उसके चेहरे पे मैंने मुस्कान देखी और मैं समझ गया कि आज बात बन ही जायेगी।

होटल में कमरा ले कर हम कमरे में पहुँचे, अपना सामान रखा और एक दूसरे के बाजू बैठ कर बातें करने लगे। हम दोनों ही शायद एक शुरुआत के मोहताज़ थे। थोड़ी देर बाद मैंने ही बातों बातों में अभिलाषा की जांघ पे हाथ रखा और उसको सहलाने लगा।
उसकी तरफ से कोई ऐतराज़ न देख मैंने अपना सर अभिलाषा की गोद में रख दिया और उसके चेहरे को अपने हाथों से सहलाने लगा। मैंने अभिलाषा के सर को थोड़ा अपनी तरफ किया और वह खुद को थोड़ा ढीला छोड़ते हुए अपने होंठ मेरे होंठों पे रख उन्हें चूमने लगी।
चूमते चूमते मेरी जीभ अभिलाषा की जीभ से लिपटने लगी और हम दोनों ने एक लंबी पप्पी की शुरुआत की जो करीब चार से पांच मिनट तक चली।

फिर मैंने अभिलाषा को थोड़ा आराम करने को कहा और पलंग पे जाकर लेट गया। लेटने से पहले मैंने अपनी जीन्स और शर्ट जरूर उतार दी और फिर रजाई में घुस कर लेट गया।

अभिलाषा सोफे पे ही बैठी शर्मा रही थी कि मैंने हवा में उसकी तरफ एक पप्पी उछाल दी। उसको जब कुछ समझ नहीं आया तो मैंने उसको रज़ाई में आने को कहा। मैंने रजाई के अंदर ही अपनी चड्डी कुछ इस तरह उतारी जिससे अभिलाषा को पता ना चले कि मैं रजाई के अंदर पूरी तैयारी में हूँ।
थोड़ी ना नकुर के बाद अभिलाषा भी बिस्तर पे आ गई और मैंने उसको अपनी बाहों में भर लिया।

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हम दोनों के होंठ एक दूसरे को चूम रहे थे और मैं अपनी जीभ से उसकी लपलपाती जीभ को महसूस कर सकता था। मेरे हाथ अभिलाषा की पीठ पर घूम रहे थे और मैं धीरे धीरे अभिलाषा को अपने ऊपर लेने की कोशिश कर रहा था।
इसी बीच मैंने एक हाथ को अभिलाषा की टीशर्ट के अंदर हाथ डाल कर उसकी ब्रा का हुक खोल दिया और दूसरे हाथ को उसकी जीन्स के अंदर कर उसकी गांड को सहलाने लगा था।

अभिलाषा गर्म हो चुकी थी पर अभी भी वो हल्का विरोध कर रही थी पर क्योंकि हम दोनों अभी भी एक दूसरे के होंठों को चूस रहे थे तो वो मुझे कुछ कह नहीं पा रही थी।

उसकी गांड को सहलाते सहलाते मेरी उंगलियाँ उसकी गांड के छेद तक पहुंच चुकी थी और अब मैं जब भी उसकी गांड के छेद को छेड़ता तो उसके शरीर की सिहरन को महसूस कर सकता था। उसके मुँह से घुटी घुटी सिसकारियां भी सुनी जा सकती थीं।
अभिलाषा अभी भी मेरे साइड में ही लेटी थी और अब उसके हाथ भी मेरे शरीर पर घूमने लगे थे।

धीरे धीरे मैं उसके हाथ को अपने लंड की तरफ ले जा रहा था जो की बेसब्री से उसके हाथ की गर्मी को महसूस करने का इंतज़ार कर रहा था।

और यह क्या… अभिलाषा ने जैसे ही मेरे लंड को छुआ, उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया और अपने होंठों को मेरे से दूर करते हुए उसने सवालिया निगाहों से मुझे देखा।
मैंने पूछा- क्या?
अभिलाषा- तुमने अपने सारे कपड़े कब निकाले?
मैंने कहा- तुमने ध्यान नहीं दिया? जब मैं रजाई में घुसा था, तभी मैंने अपने कपड़े उतार दिए थे। पर हुआ क्या है?
अभिलाषा- ये सब गलत है राहुल, हम ये नहीं कर सकते!
मैंने कहा- मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ अभिलाषा, और मैं जानता हूँ कि तुम भी करती हो, वरना आज यहाँ मेरे साथ नहीं होती।
अभिलाषा चुप थी और उसकी चुप्पी ही उसकी हाँ भी थी।

मैं आगे बोला- मैं तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ अभिलाषा, तुम्हें बहुत सारा प्यार करना चाहता हूँ। तुम्हें हर वो सुख देना चाहता हूँ जो तुम्हें मिलना चाहिए।
इतना कहकर मैंने फिर से अभिलाषा का हाथ अपने लंड पर रख दिया जिसका उसने अब विरोध नहीं किया।

अब अभिलाषा मेरे लंड का हल्के हाथ से मर्दन करने लगी थी और हम दोनों के होंठ फिर से एक हो गए। मैं अभिलाषा को अपने ऊपर ले चुका था और मेरे हाथ अभिलाषा की टीशर्ट को ऊपर उठा कर उसकी चुची को सहलाने लगे थे।
मैंने अभिलाषा की टीशर्ट को उसकी ब्रा से साथ ही उसके जिस्म से अलग किया और अब मैं पहली बार उसकी ख़ूबसूरत चुची को अपनी आँखों से देख रहा था। इतनी ख़ूबसूरत चुची को देखते ही मैंने अपने मुँह में भर लिया और उसके मुँह से जो आह निकली, वो मुझे आज तक याद है।

मेरे दोनों हाथ अभिलाषा की गांड सहला रहे थे और धीरे धीरे मैं उसकी जीन्स भी नीचे करने लगा था। अभिलाषा की सहमति इस बात से पता चलती है कि उसने मेरे हाथों को अपनी बेल्ट पर रख कर उसको खोलने का इशारा किया और खुद को थोड़ा ऊपर उठा कर मुझे अपनी बेल्ट खोलने में मदद भी की।
मैंने देर न करते हुए उसकी जीन्स उतार दी और उसकी चुत को पैंटी के ऊपर से ही अपनी मुट्ठी में भर लिया तो पाया कि उसकी चुत ऐसे पानी छोड़ रही थी जैसे कोई नल ही खुल गया हो।

मैंने अभिलाषा को पलंग पे लेटने को कहा और खुद उसके शरीर को जीभ से चाटने लगा। थोड़ी ही देर में मैं उसकी एक चुची को चूस रहा था और दूसरी चुची की घुंडी को मरोड़ रहा था जबकि मेरा दूसरा हाथ अब भी उसकी चुत को मुट्ठी में दबाने का काम कर रहा था।
अभिलाषा ऐसे तड़प रही थी जैसे पानी बिन मछली और अब उसने मेरे सिर को अपनी चुत की तरफ धकेलना शुरू कर दिया था। उसकी बात समझते हुए मैंने उसकी चुची को छोड़ कर नीचे बढ़ना शुरू किया और उसकी नाभि पे आके मेरी जीभ रुक गई। मैं उसकी सुन्दर, सुडौल और सेक्सी नाभि को अपनी जीभ से पिनिया रहा था और उसके पेट की थिरकन बता रही थीं कि उसको कितना आनन्द आ रहा है।

उसकी सिसकियाँ अब हल्की कराहटों में बदल चुकी थीं और उसके हाथ अभी भी मुझे नीचे धकेलने में लगे थे। कुछ और देर उसकी नाभि से खेलने के बाद मैं उसकी चुत की तरफ बढ़ा और उसकी पैंटी के ऊपर से ही उसकी चुत को चूमने चाटने लगा। अभिलाषा अपने पैर ऊपर उठा चुकी थीं और बुरी तरह से काँप रही थी।

मैंने उसकी पैंटी को दोनों हाथों से पकड़ कर एक झटके में उतार दिया और अब अभिलाषा मेरे सामने जन्मजात नंगी अवस्था में लेटी थी। जैसे ही मैंने उसकी पैंटी उतारी, उसने बड़े ही नशीले स्वर ने मेरा नाम पुकारा- ओह रआआआ… हुललललल…
मैंने देर न करते हुए उसकी चुत को चाटना शुरू किया और मेरे दोनों हाथ अब उसकी चुची का मर्दन कर रहे थे। अभिलाषा मेरे सिर को अपनी चुत में ऐसे धकेल रही थी जैसे मेरा पूरा सिर अपनी चुत में ही घुसा देगी।

कुछ ही देर में अभिलाषा का शरीर अकड़ने लगा और उसकी चुत से अब मादक रसों का झरना बहने लगा जिसको मैंने अपनी जीभ से चाट कर साफ़ किया। उसके रस से आ रही मादक खुशबू पूरे कमरे में फ़ैल चुकी थीं और हम दोनों को भी चरम पे पंहुचा रही थी।
आम तौर पे लड़की झड़ने के बाद ठंडी पड़ती है पर अभिलाषा मुझे अपने ऊपर खींचने लगी और बोली- राहुल, मेरी आग शांत कर दो। बहुत दिनों से तुम्हारे प्यार का इंतज़ार था मुझे और अब मैं और नहीं रुक सकती। प्लीज, मुझे अपने प्यार की बौछार से गीला कर दो राहुल…

मेरा लंड भी बहुत देर से खड़ा था और अब थोड़ा दर्द करने लगा था। मेरे पास इसको राहत पहुंचाने का कोई और रास्ता नहीं था तो मैंने अपने लंड को अभिलाषा की चुत पे लगाया और उसकी चुत को अपने लंड से थपथपाने लगा।
अभिलाषा मुझसे चुदाई के लिए भीख से मांग रही थी और मुझे उसको तड़पाने में जो मज़ा आ रहा था, उसको बयां करना सूरज को दीपक दिखाने जैसा ही है। इसको सिर्फ वही लोग समझ सकेंगे जिन्होंने कभी अपनी साथी को यूँ तड़पाया हो या तड़पते देखा हो।
यह एक ऐसी अनुभूति है जिससे ज्यादा सुखद शायद कुछ नहीं।

अब अभिलाषा नीचे से अपनी चुत को ऊपर उठा कर मेरे लंड को निगलने की कोशिश करने लगी। प्यार की लालसा में उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे और बार बार वो अपनी चुत को ऊपर उठा कर मेरा लंड निगलने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
मैंने मौका देखते हुए अभिलाषा की चुत में तब झटका मारा जब वो अपनी चुत को ऊपर उठा कर मेरा लंड निगलने की कोशिश कर रही थीं। क्योंकि अभिलाषा पहले ही एक बार झड़ चुकी थी और मैंने धक्का भी उसकी ऊपर आती चुत में मारा था तो मेरा लंड एक ही झटके में अभिलाषा की चुत को चीरते हुए उसकी बच्चेदानी से जा टकराया और अभिलाषा की जोरदार चीख उम्म्ह… अहह… हय… याह… कमरे में गूंज गई।

अभिलाषा इतनी ज़ोर से चीखी कि एक बार तो मैं भी डर गया पर धीरे धीरे वो सामान्य होने लगी थी। उसने शायद बहुत दिनों के बाद कोई लंड लिया था और इस प्रहार के लिए वो तैयार नहीं थी।
हर धक्के से मेरा लंड अभिलाषा की चुत की दीवारों को चीरता हुआ अंदर प्रविष्ट हो रहा था और इस चुदाई से होने वाले आनन्द को अभिलषा की आँखों में साफ़ देखा जा सकता था।
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